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केन्द्र सरकार का निर्णय किसानों के लिए आत्मघाती कदम होगा साबित: पंकज प्रजापति

  • केंद्र सरकार किसान बिल वापस नही लिया तो झामुमो सड़क के सदन तक विरोध करेगा
  • झामुमो के सैकड़ो कार्यकर्ता सड़क पर उतरे, केंद्र सरकार का खुलेआम किया विरोध

चतरा। झामुमो चतरा जिला कमिटी के द्वारा केन्द्र सरकार के कृषि बिल 2020 के द्वारा लिए गए निर्णय के विरोध में मंगलवार को चतरा समाहरणालय समक्ष एकदिवसीय धरना प्रदर्शन किया गया। जिसकी अध्यक्षता झामुमो जिला अध्यक्ष पंकज कुमार प्रजापति ने किया। मंच संचालन झामुमो नेता  गुरुदयाल साव ने किया। जिला अध्यक्ष ने धरना को संबोधित करते हुए कहा कि भाजपा
केंद्र सरकार द्वारा पारित काले कानून (कृषि विधेयक 2020) को निरस्त करने तक हमसब सड़क से लेकर सदन तक उतरने का कार्य करेंगे। श्री प्रजापति ने कहा कि विगत दिनों भाजपा नेतृत्व वाली केंद्र सरकार द्वारा “आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक, 2020”, “कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) विधेयक 2020″एवं “मूल्य आश्वासन पर किसान (बंदोबस्ती और सुरक्षा) समझौता और कृषि सेवा बिल, 2020″(कृषि विधेयक 2020) संसद से बिना बहस के जबरन पारित करवाया गया जो अंग्रेजों की याद दिलाती है। कृषि विधेयक पूर्व में किसानों एवं आम जनों के हित को देखते हुए लागू किये गए थे। परन्तु वर्तमान संसोधन विधेयक के पारित होने के पश्चात इसका सीधा लाभ पूंजीपतियों एवं बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों को मिलना तय हो गया है, देश के बाजारों में काला बाज़ारी करने की खुली छूट दे दी गई है, इसके साथ ही भाजपा नेतृत्व वाली केंद्र सरकार का किसान एवं मजदूर विरोधी चरित्र उजागर हो गया है। झामुमो जिलाध्यक्ष ने आगे कहा कि
केंद्र सरकार, देश के गरीब किसान-मजदूर एवं आम जनों के खिलाफ षडयंत्र रच कर देश की ‘हरित क्रांति’ को हराने की साजिश कर रही है।बहुमत के मद में निरंकुश मोदी सरकार ने कृषि विधेयक बिल 2020 को संसद में बगैर किसी चर्चा व विचार विमर्श के जबरन पारित कर लिया है। यहां तक कि राज्यसभा में संसदीय प्रणाली व प्रजातंत्र को तार-तार कर ये काले कानून पारित किए गए। अनाज मंडी-सब्जी मंडी को खत्म करने से ‘कृषि उपज खरीद व्यवस्था’ पूरी तरह नष्ट हो जाएगी। ऐसे में किसानों को न तो ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (MSP) मिलेगा और न ही बाजार भाव के अनुसार फसल की कीमत। किसान की फसल को दलाल औने-पौने दामों पर खरीदकर दूसरे प्रांतों की मंडियों में मुनाफा कमा ऊंचे दामों में बेच देते हैं। अगर पूरे देश की कृषि उपज मंडी व्यवस्था ही खत्म हो गई, तो इससे सबसे बड़ा नुकसान किसान-खेतिहर मजदूर को होगा और सबसे बड़ा फायदा मुट्ठीभर पूंजीपति वर्ग को मिलेगा एवं मंडी प्रणाली नष्ट होते ही सीधा प्रहार स्वाभाविक तौर से किसान पर ही होगा। मंडियां खत्म होते ही अनाज-सब्जी मंडी में काम करने वाले लाखों-करोड़ों मजदूरों, आढ़तियों, मुनीम, ढुलाईदारों, ट्रांसपोर्टरों आदि की रोजी रोटी और आजीविका अपने आप खत्म हो जाएगी।

मंडी में पूर्व निर्धारित ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (MSP) किसान की फसल के मूल्य निर्धारण का बेंचमार्क है। यही एक मात्र उपाय है। जिससे किसान की उपज का मूल्य निर्धारण हो पाता है। अनाज-सब्जी मंडी व्यवस्था किसान की फसल की सही कीमत, सही वजन व सही बिक्री की गारंटी है। अगर किसान की फसल को मुट्ठीभर कंपनियां मंडी में सामूहिक खरीद की बजाय उसके खेत से खरीदेंगे तो फिर मूल्य निर्धारण, एमएसपी, वजन व कीमत की सामूहिक मोलभाव की शक्ति खत्म हो जाएगी।

अगर मुट्ठी भर पूंजीपतियों ने किसान के खेत से खरीदी हुई फसल का एमएसपी नहीं दिया। तो क्या मोदी सरकार एमएसपी की गारंटी देगी? किसान को न्यूनतम समर्थन मूल्य आखिर कैसे मिलेगा? स्वाभाविक तौर से इसका नुकसान किसान को होगा आज बिगत 30 वर्षों से भाजपा का साथी रहे शिरोमणि अकाली दल आज भाजपा से अलग हो गई और उनके केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर इस काले कानून के बिरोध में मंत्री पद से इस्तीफा दे दी।

नए काले कानून के माध्यम से किसान को ‘ठेका प्रथा’ मे फंसाकर उसे अपनी ही जमीन मे बंधुआ मजदूर बना दिया जाएगा। क्या दो से पाँच एकड़ भूमि का मालिक गरीब किसान बड़ी बड़ी कंपनियों के साथ फसल की खरीद फरोख्त का कॉन्ट्रैक्ट बनाने, समझने व साईन करने में सक्षम हो पाएगा? जब मंडी व्यवस्था खत्म होगी तो किसान केवल कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग पर निर्भर हो जाएगा और बड़ी कंपनियां किसान के खेत में उसकी फसल की मनमर्जी की कीमत निर्धारित करेंगी।

यह नई जमींदारी प्रथा नहीं तो और क्या है?

कृषि उत्पाद, खाने की चीजों व फल-फूल-सब्जियों की स्टॉक लिमिट को पूरी तरह से हटाकर न तो किसान को फायदा होगा और न ही उपभोक्ता को। बस उत्पादों की जमाखोरी और कालाबाजारी करने वाले मुट्ठीभर लोगों को फायदा होगा। वो सस्ते भाव में उत्पादों को खरीदकर, कानूनन जमाखोरी कर महंगे दामों पर उत्पादों को बेच पाएंगे।

खेती का संरक्षण और प्रोत्साहन स्वाभाविक तौर से राज्यों का विषय है, परंतु उनकी कोई राय नहीं ली गई। उल्टा खेत खलिहान व गांव की तरक्की के लिए लगाई गई मार्केट फीस व ग्रामीण विकास फंड को एकतरफा तरीके से खत्म कर दिया गया। यह अपने आप में संविधान की परिपाटी के विरुद्ध है। देश के किसान, मजदूर एवं आम जनों की केंद्र सरकार द्वारा आवाज दबाने वाले कानून को तत्काल निरस्त किया जाए नही तो झामुमो के एक एक कार्यकर्ता सड़क से लेकर सदन तक बिरोध किया जाएगा जब तक यह काला कानून वापस न हो जाय।

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