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पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को दिए कई सुझाव, मुख्यमंत्री को लिखा पत्र

रांची। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने राज्य में कोरोना संक्रमण को देखते हुए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को सुझाव भरा पत्र लिखा है। पत्र में लिखा है कि विपदा की यह घड़ी टीका टिप्पणी के लिये नहीं है। लेकिन सार्वजनिक जीवन में काम करने के चलते जो भी बातें मेरे संज्ञान में आ रही है उसे राज्य हित में आपके संज्ञान में लाना हम जैसे लोगों की नैतिक ज़िम्मेदारी है। थोड़ा समय निकाल इस पर ग़ौर करेंगे।

पीएम केयर से झारखंड को कोरोना काल में निम्नलिखित 574 वेटिंलेटर मिलने और निम्न सूची के मुताबिक़ इनका वितरण कर दिये जाने की जानकारी है। कहने के लिये इनमें से अधिकांश का इंस्टॉलेशन भी दिखला दिया गया है। लेकिन वास्तव में यह दिखावे का काग़ज़ी आँकड़ा है।

मुझे बताया गया है इनमें से इक्का-दुक्का नामचीन जगहों को छोड़कर अधिकांश जगहों पर या तो वास्तव में वेंटिलेटर इंस्टॉल हुए नहीं और अगर कहीं हुए भी तो विभिन्न तकनीकी कारणों से उपयोग में नहीं लाये जा सके।

अख़बारों में देख रहा हूँ कि बड़े पैमाने पर कोविड बेड वाले अस्थायी सेंटर्स बनाये जा रहे हैं, यह अच्छी बात है। होनी भी चाहिये। लेकिन फिर क्या कारण है कि लोग अस्पतालों में जगह के लिये मारे मारे फिर रहे हैं और घरों में लाईलाज तड़प-तड़प कर मर रहे हैं?यह गंभीर सवाल विचारणीय है।

मुझे लगता है कि अभी वाले कोरोना का जानलेवा क़हर जिस रूप में आया है उसमें नम्बर गिनाकर वाहवाही लूटने वाले साधारण कोविड बेड वाले सेंटर्स की नहीं बल्कि आईसीयू, वेंटिलेटर वाले सुविधा युक्त बेड्स की ज़रूरत है। जिसकी कमी के चलते अफ़रातफ़री मची हुई है।

आपकी प्राथमिकता जितना कम समय में हो सके आईसीयू और वेंटिलेटर वाले बेड्स को बढ़ाकर/बढ़वाकर ज़्यादा से ज़्यादा लोगों की जान बचाने के प्रयास की होनी चाहिये न कि खुद घूम -घूम कर आक्सीजन रिफिल केन्द्र का मुआयना करने की। यह काम औरों को करने दीजिये और आप जीवन रक्षक बेड की चिंता करिये।

राजधानी राँची में रिम्स, सदर अस्पताल के साथ जो चार-पाँच प्रमुख प्राइवेट अस्पताल हैं जहां कम से कम समय में जीवन रक्षक बेड युक्त सुविधा बनाकर लोगों को दिलायी जा सकती है, इस काम पर फ़ोकस करिये।

यत्र-तत्र बेकार पड़े वेंटिलेटर जो वैसे जगहों पर अभी चलवाये ही नहीं जा सकते उन्हें शोभा की वस्तु मत बनाइये। मंगवाईये और जहां कहीं भी उसे उपयोगी बनाया ज़ा सके वहाँ शुरू कराईये।

मैं मानता हूँ कि देवदूत की तरह काम कर रहे सरकारी- ग़ैर सरकारी जीवन रक्षक मेडिकलकर्मी योद्धाओं पर कई गुणा दिन-रात काम के तनाव का भारी दबाव है। उन्हें भरोसे में लीजिये, उनकी पीड़ा समझिए, हौसला अफ़जाई करिये। कहिये कि इस संकट की घड़ी में आपके योगदान का राज्य ही नहीं राष्ट्र ऋणी रहेगा।

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