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टीका बनाने की उम्मीदों पर भारी पड़ा कंपनियों का शॉर्टकट

  • कंपनियां अब कह रही हैं कि अगर टीका 50 फीसदी भी सफल रहा तो बड़ी बात होगी

दशकों में तैयार होने वाले टीके को एक साल में बनाने का कंपनियों का शॉर्टकट कोरोना का इलाज मिलने की उम्मीदों पर भारी पड़ता दिख रहा है। साल के अंत तक अचूक टीका बनाने का दावा कर चुकीं कंपनियां अब कह रही हैं कि अगर टीका 50 फीसदी भी सफल रहा तो बड़ी बात होगी। यह टीका मध्यम या गंभीर स्तर के कोरोना के मरीजों पर कारगर होगा भी नहीं, इस पर सवाल खड़े हो गए हैं।

इससे टीके की हो़ड़ में आगे चल रहीं मॉडर्ना, फाइजर और एस्ट्राजेनेका की कलई खुलने लगी है। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल के विशेषज्ञों ने सवाल उठाया है कि अगर दिग्गज कंपनियों की वैक्सीन सिर्फ कोरोना के मामूली लक्षण वाले मरीजों को ही सुरक्षा कवच दे पाएंगी और मौत के मुंह में जा रहे गंभीर मरीजों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाएगा तो अरबों डॉलर फूंकने का क्या फायदा। वैक्सीन का मतलब ही है कि गंभीर मरीजों को इलाज मुहैया कराया जाए। दरअसल, कंपनियों ने पिछले हफ्ते जारी अपने प्रोटोकॉल में कहा है कि अगर वैक्सीन कोरोना के मामूली लक्षण वाले मरीजों में खतरे को कम करने में सफल रहती है तो इसे कामयाबी माना जाएगा। यानी कि मध्यम या गंभीर स्तर के मरीजों, अस्पताल या आईसीयू में भर्ती मरीजों के लिए टीका तैयार करने की कवायद ही नहीं चल रही है।

मैरीलैंड यूनिवर्सिटी में फार्मेसी स्वास्थ्य सेवा अधिकारी डॉ. पीटर दोषी का कहना है कि मॉडर्ना और एस्ट्राजेनेका दोनों ने ही 30-30 हजार लोगों पर तीसरे चरण का परीक्षण का वादा किया है जबकि फाइजर 44 हजार पर ट्रायल करने की बात कह रही है। इसमें वालंटियर को तीन-चार हफ्तों के बीच वैक्सीन की दो खुराक दी जानी है और इस कवायद को पूरा करने में चार-पांच माह कम से कम लगेंगे। मगर कंपनियों का कहना है कि अगर टीका खांसी-जुकाम जैसे मामूली लक्षणों के साथ पॉजिटिव पाए गए 150-160  प्रतिभागी पर भी कारगर रहता है तो इसे सफल घोषित कर दिया जाएगा।

पूरी आबादी के लिए नहीं होगा टीका
मॉलीक्यूलर मेडिसिन के प्रोफेसर डॉ. एरिक ट्रिपोल का कहना है कि कोविड के सबसे ज्यादा मरीज भले ही मामूली लक्षण वाले हों, लेकिन इन पर कारगर टीका यह साबित नहीं करता कि मध्यम और गंभीर मरीजों में भी वायरस का खतरा नहीं रहेगा। टीका पूरी आबादी के लिए नहीं होगा। बूढ़े और गंभीर बीमारियों वाले मरीजों को कोई लाभ नहीं मिलेगा। जब बिना टीके के ही मामूली लक्षण वाले और पहले किसी बीमारी से नहीं पीड़ित लोग ठीक हो रहे हैं तो क्या कंपनियां सिर्फ मुनाफे के लिए वैक्सीन का ढोल पीट रही हैं। बच्चों,  किशोरों और गर्भवती महिलाओं पर भी आगे ट्रायल होगा यह तय नहीं।

एफडीए कसेगा शिकंजा
अमेरिका की शीर्ष स्वास्थ्य एजेंसी एफडीए ने कह दिया है कि ट्रायल सही मानव परीक्षण पर आधारित होने चाहिए। यह टीका मध्यम या गंभीर स्तर के मरीजों पर भी कारगर साबित होना जरूरी है। एफडीए वैक्सीन कंपनियों के लिए नई गाइडलाइन अगले हफ्ते तक जारी करेगा। इसमें टीके की आपात मंजूरी चाहने वाली कंपनियों को तीसरे चरण के परीक्षण में प्रतिभागियों को दूसरी खुराक देने के करीब दो माह तक उसकी प्रभाव क्षमता का आकलन करना होगा। मंजूरी के लिए गंभीर मरीजों और बुजुर्गों में भी टीके की प्रभाव क्षमता सिद्ध करनी होगी।

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